Friday, 8 September 2017

अपारख का अंग

अपारख का अंग

अथ श्री  दरियावजी महाराज की दिव्य वाणीजी का " अपारख का अंग " प्रारंभ । राम !

हीरा हलाहल क्रोड़ का, जा का कौड़ी मौल ।
जन दरिया कीमत बिना, बरतै डाँवाँडोल (1) 

आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि हीरा तो बहुत कीमती तथा करोड़ों रूपयों का है परन्तु जब यह हीरा किसी मूर्ख व्यक्ति के हाथ में आया तो वह हीरे की कीमत नहीं जानने के कारण उसका उपयोग नहीं कर सका । इसी प्रकार परमात्मा की सत्ता होने पर भी परमात्मा का महत्व नहीं जान पाने के कारण आज संसार नरक और चौरासी में जा रहा है । राम राम  !

हीरा लेकर जौहरी, गया गिंवारे देश ।
देखा जिन कंकर कहा, भीतर परख न लेश (2) 

आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि एक बहुत बड़ा जौहरी बहुत ही कीमती हीरा लेकर किन्हीं मूर्खों के गाँव में पहुँचा ।उसने हीरा खोलकर उन्हें दिखाया तो वह मूर्ख कहने लगे कि यह तो  एक चमकीला पत्थर है क्योंकि उन्हें परख नहीं थी । महाराजश्री कहते हैं कि मुझे इस बात का आश्चर्य होता है तथा दुःख भी होता है कि प्रभु की सत्ता  वर्तमान होने पर भी लोग उस सत्ता को स्वीकार करके अपना कल्याण नहीं कर पा रहे हैं । राम राम!

दरिया हीरा क्रोड़ का, कीमत लखै न कोय ।
जबर मिले कोई जौहरी, तब ही पारख होय  (3) 

आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि हीरा तो करोड़ों रुपयों का है परन्तु जब कोई जौहरी मिलता है , तब ही उसकी परीक्षा हो सकती है । इसी प्रकार जिस व्यक्ति के हृदय में भक्ति का अंकुर है वही महापुरुषों को पहचान सकते हैं । राम राम  !

आई पारख चेतन भया, मन दे लीना मोल ।
गाँठ बाँध भीतर धसा, मिट गई डाँवाँडोल (4) 

आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि जब परीक्षा हुई, तब उस मूर्ख के हृदय में चेतनता आई तथा उसे हीरे के प्रति लगाव हुआ । तत्पश्चात उसने हीरे को एक  सुरक्षित स्थान पर रखकर ताला लगा दिया तथा करोड़पति बन गया । इसी प्रकार जब मानव को भगवत नाम के महत्व के विषय में ज्ञान हो जाता है, तब वह राम नाम रुपी हीरे संग्रह करके अत्यंत धनवान हो जाता है । राम राम!

कंकर बाँधा गाँठड़ी, कर हीरा का भाव ।
खोला कंकर नीसरा,झूठा यही सुभाव (5) 

आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि आज वर्तमान में मानव समाज की दौड़ केवल अर्थसंग्रह को लेकर हो रही है । रात-दिन एक  करके आज हम यह कंकर ही इकट्ठे कर रहे हैं । परंतु मन में भले ही इन्हें हीरे मान लो परन्तु मरते समय यह सब कंकर हो जायेंगे । इस देव दुर्लभ मानव शरीर की महिमा केवल इसके सदुपयोग से ही है । राम राम!

अथ श्री दरियावजी महाराज की दिव्य वाणीजी का " अपारख का अंग " संपूर्ण हुआ । राम

आदि आचार्य श्री दरियाव जी महाराज एंव सदगुरुदेव आचार्य श्री हरिनारायण जी महाराज की प्रेरणा से श्री दरियाव जी महाराज की दिव्य वाणी को जन जन तक पहुंचाने के लिए वाणी जी को यहाँ डिजिटल उपकरणों पर लिख रहे है। लिखने में कुछ त्रुटि हुई हो क्षमा करे। कुछ सुधार की आवश्यकता हो तो ईमेल करे dariyavji@gmail.com .

डिजिटल रामस्नेही टीम को धन्येवाद।
दासानुदास
9042322241

चिन्तामणी का अंग

चिन्तामणी का अंग 

अथ श्री दरियावजी महाराज की दिव्य वाणिजी का "चिन्तामणी का अंग " प्रारंभ । राम !

चिंतामणि चौकस चढ़ी, सही रंक के हाथ ।
ना काहू के सँग मिलै , ना काहू से बात (1) 

आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि जब किसी गरीब व्यक्ति को चिन्तामणी प्राप्त हो जाती है , तो वह किसी का संग नहीं करता है । क्योंकि यदि लोगों को पता लग गया तो यह खबर राजा तक पहुंच जाएगी तथा राजा उससे चिन्तामणी छीन लेगा । इसी प्रकार जो परमात्मा रूपी चिंतामणि प्राप्त महापुरुष होते हैं वे जगत का संग नहीं करते हैं । राम राम!

दरिया चिंतामणि रतन, धरयो स्वान पै जाय ।
स्वान सूंघ कानैं भया, टूकां ही की चाय (2) 

आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि जब यह चिंतामणी कुत्ते के सामने रखी गई तो कुत्ता बेचारा चिंतामणी के पास आया, उसे सूंघा तथा सूंघकर दूर हो गया  क्योंकि उसके मन में तो पेट भरने हेतु रोटी प्राप्त करने की ही इच्छा थी । जब तक परमात्मा की कीमत के विषय में हमें ज्ञान नहीं है, तब तक हम परमात्मा के नाम को स्वीकार नहीं कर रहे हैं । परन्तु जब सतगुरु की कृपा से भगवत नाम के विषय में जानकारी हो जायेगी, तब हम एक क्षण के लिए भी नाम को अपने हृदय से निकाल नहीं पायेंगे  । राम राम!

दरिया हीरा सहस दस, लख मण कंचन होय । 
चिंतामणी एकै भला, ता सम तुलै न कोय (3) 
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि हजारों की संख्या में हीरे हैं तथा कई लाख मन सोना है और चिंतामणी एक ही है , तथापि यह सारी संपति चिंतामणी की तुलना में नगण्य है । अतः महाराजश्री ने भगवत नाम को चिन्तामणी के समान बताया है । यदि आपने राम नाम का जाप कर लिया तो सब कुछ कर लिया । राम राम!

अथ श्री दरियावजी महाराज की दिव्य वाणीजी का चिंतामणी का अंग संपूर्ण हुआ । राम 

आदि आचार्य श्री दरियाव जी महाराज एंव सदगुरुदेव आचार्य श्री हरिनारायण जी महाराज की प्रेरणा से श्री दरियाव जी महाराज की दिव्य वाणी को जन जन तक पहुंचाने के लिए वाणी जी को यहाँ डिजिटल उपकरणों पर लिख रहे है। लिखने में कुछ त्रुटि हुई हो क्षमा करे। कुछ सुधार की आवश्यकता हो तो ईमेल करे dariyavji@gmail.com .

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साध का अंग

साध का अंग

अथ श्री दरियावजी महाराज की दिव्य वाणीजी का साध का अंग प्रारंभ ।

दरिया लक्षण साध का, क्या गिरही क्या भेख ।
निःकपटी निसंक रहे, बाहर भीतर एक  (1)

आचार्यश्री दरियावजी महराज फरमाते हैं कि साधना करने वाले भेषधारी तथा गृहस्थी सभी साधकों को साधु कहते हैं । सच्चे साधु का तो यही लक्षण है कि वह सदा निष्कपटी और निःशंक रहता है तथा न ही कभी उसके मन में परमात्मा के प्रति किसी प्रकार का संशय उत्पन्न होता है । वह तो सदा बाहर भीतर एक रहता है । राम राम!

सतगुरु को परसा नहीं, सीखा शब्द सुहेत ।
दरिया कैसे नीपजै , तेह बिहुणा खेत (2)

आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि सतगुरु के सानिध्य में नहीं आए तथा यूँ ही मनमुखी होकर राम-राम करने लग गये तो इससे कार्य की सिद्धि नहीं होगी । जिस प्रकार बिना तेह के अर्थात जब तक भूमी अंदर से गीली नहीं होती तब तक खेत में बीज नहीं ऊगता है । उसी प्रकार जिसने सतगुरु से हेत नहीं किया तथा शब्द से हेत कर लिया, उसका कभी कल्याण नहीं हो सकता । राम राम  !

सत्त शब्द सतगुरु मुखी, मत गयन्द मुख दन्त ।
यह तो तोड़ै पोल गढ़, वह तोड़ै करम अनन्त  (3) 

आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि जिस प्रकार हाथी से लगे हुए हाथी के दांत बड़े बड़े गढ़ों की पोल को नष्ट कर देते हैं । उसी प्रकार सतगुरु से लगा हुआ शिष्य अनन्तानन्त कठिन कर्मों  को तोड़कर नष्ट कर देता है । राम राम  !

दाँत रहै हस्ती बिना, तो पोल न टूटे कोय ।
कै कर धारै कामिनी, कै खेलाराँ होय (4)

आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि जो दाँत हाथी से अलग होता है , उसके तो केवल खिलोने अथवा स्त्रियों के हाथ के कंगन ही बन सकते हैं । उसके द्वारा पोल टूटनी तो असंभव है । उसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन में साधक ऐसे ही मनमुखी होकर, सतगुरू का आश्रय लिये बिना ही साधना करता है तो उसे साधना में सफलता मिलनी असंभव है । राम राम!

साध कह्यो भगवन्त कह्यो, कहै ग्रन्थ और वेद ।
दरिया लहै न गुरू बिना, तत्त नाम का भेद (5)

आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि मैं अकेला ही नहीं , सभी सन्त और भगवन्त अर्थात भगवान तथा ईश्वर कोटि के महापुरुष भी यही बात कहते हैं एवं वेदों तथा ग्रन्थों में भी  यही बात आती है कि सतगुरु के बिना राम नाम के तत्व का भेद प्राप्त नहीं होता है । अतः तत्व के विषय में समझने के लिए ही सतगुरु की आवश्यकता है ।राम राम  !

राजा बाँटै परगना, जो गढ़ को पति होय ।
सतगुरु बाँटै रामरस , पीवै बिरला कोय (6)

आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि पुराने जमाने में जो शूरवीर किसी बहुत बड़े संकट से देश को उबार लेते थे , उनके ऊपर प्रसन्न होकर राजा उन्हें गाँव वगैरह ईनाम में देते थे । इसी प्रकार सतगुरु रामरस बाँटते हैं परन्तु कोई बिरले ही उसे पी सकते हैं । प्रत्येक व्यक्ति रामरस नहीं पी सकता । राम राम!

मतवादी जानै नहीं, ततवादी की बात ।
सूरज ऊगा उल्लवा , गिनै अंधारी रात (7)

आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि जो व्यक्ति मत में बंधे हुए होते हैं, वे तत्ववादियों की बात नहीं जानते हैं । सूर्य उदय होने पर भी उल्लू तो यही समझता है कि अभी अंधेरी रात है । उल्लू बेचारा तो मत में बंधा हुआ अज्ञानी है । परमात्मा के प्यारे भक्त ही भगवत्कृपा से तत्व के गूढ़ रहस्य को जान सकते हैं । राम राम!

भीतर अंधारी भींत सो,बाहर ऊगा भान ।
जन दरिया कारज कहा , भीतर बहुली हान (8)

आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि बाहर सूर्य उदय हो गया है परन्तु भीतर में अन्धकार है तो इससे कोई लाभ नहीं होगा । अतः भीतर से प्रकाश होना आवश्यक है। अन्धकार का तात्पर्य अंतःकरण में अज्ञान से है जिसे अधिक से अधिक राम नाम जाप द्वारा मिटाया जा सकता है । राम राम!

सीखत ज्ञानी ज्ञान गम, करै ब्रह्म की बात ।
दरिया बाहर  चाँदना , भीतर काली रात  (9) 

आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि झूठे ब्रह्मज्ञानी वेदों के चार पांच महावाक्यों का वर्णन करते रहते हैं कि मैं ही ब्रह्म हूँ । अतः मुझे भजन-ध्यान और धर्म पुण्य करने की क्या आवश्यकता है । इस प्रकार से बाहर तो प्रकाश होगा परन्तु भीतर अन्धेरा होगा तो कल्याण संभव नहीं है । भीतर  में प्रकाश करने के लिए तो श्वासोश्वास नामजाप करना होगा । राम राम  !

बाहर कुछ समझै नहीं, जस रात अंधेरी होत ।
जन दरिया भय कुछ नहीं, भीतर जागै जोत (10) 
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि बाहर तो अंधेरा है परन्तु यदि अंदर में  प्रकाश है तो कोई भय की बात नहीं है । अर्थात आध्यात्मिक ज्ञान तो है परन्तु भौतिक ज्ञान नहीं है तो उसका कल्याण अवश्य हो जाएगा । अध्यात्म ज्ञान हेतु महापुरूषों का संग ही परम सुख का साधन है । राम राम !

अथ श्री दरियावजी महाराज की दिव्य वाणीजी का साध का अंग संपूर्ण हुआ । राम राम

आदि आचार्य श्री दरियाव जी महाराज एंव सदगुरुदेव आचार्य श्री हरिनारायण जी महाराज की प्रेरणा से श्री दरियाव जी महाराज की दिव्य वाणी को जन जन तक पहुंचाने के लिए वाणी जी को यहाँ डिजिटल उपकरणों पर लिख रहे है। लिखने में कुछ त्रुटि हुई हो क्षमा करे। कुछ सुधार की आवश्यकता हो तो ईमेल करे dariyavji@gmail.com .

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सुपने का अंग

सुपने का अंग
अथ श्री दरियावजी महाराज की दिव्य वाणीजी का सुपने का अंग प्रारंभ 

दरिया सोता सकल जग,जागत नाहिं कोय 
जागे में फिर जागनाजागा कहिये सोय (1)
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि सारा जगत सोया हुआ है  प्रातःकाल होते ही हम लोग जाग जाते हैं तथा अपनी अपनी क्रिया में रत हो जाते हैं वह जागना नहीं है जागना तो वह है जिसमें योगी परमात्मा के विरह मे जागता है  राम राम!
साध जगावे जीव कोमत कोई उट्ठे जाग 
जागे फिर सोवे नहींजन दरिया बड़ भाग (2)
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि संत-महात्मा तो जीवों को जगाते ही रहते हैं परन्तु मती अर्थात जो बुद्धिमान व्यक्ति होता हैवही जाग सकता है  इस प्रकार से जो जीव जाग जाने के पश्चात पुनः सोता नहीं हैवह बड़भागी है  आगे महाराजश्री कहते हैं कि बड़भागी वही हैजो परमात्मा के चरणों में लगा हुआ है  राम राम!
माया मुख जागे सबैसो सूता कर जान 
दरिया जागे ब्रह्म दिश , सो जागा प्रमाण  (3)
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि जो माया के सन्मुख जागा हुआ है , वह वास्तव में सोया हुआ ही है क्योंकि जो है ही नहीं उसे "मायाकहते हैं  माया के प्रभाव से मानव जागृत अवस्था में भी अपने शरीर में विद्यमान ब्रह्म को पहचानने में असमर्थ हो रहा है  अतः उसी मानव का जागना सार्थक है जो माया के बंधन से मुक्त होकर अपने शरीर में स्थित ब्रह्म का अनुभव कर सके अन्यथा  जागता हुआ संसार भी सोया हुआ ही है  राम राम  !
दरिया तो साँची कहै , झूठ  मानो कोय 
सब जग सुपना नींद मेंजान्या जागन होय (4)
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि मैं सत्य कह रहा हूँ ,झूठ नहीं बोल रहा हूँ  यह सारा संसार स्वप्नावस्था की नींद में  सोया हुआ है ।जब जीव को इस संसार से वैराग्य हो जाता हैतब जान लेना चाहिए कि यह जीव जाग गया है  केवल  सत्संगस्वाध्यायभगवत भजन इत्यादि शुभ कर्म करते रहना ही वास्तव में जागना है  राम राम  !
साँख जोग नवधा भक्तियह सुपने की रीत 
दरिया जागे गुरूमुखी , तत नाम से प्रीत (5)
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि सांख्य शास्त्रयोग शास्त्र तथा नौ प्रकार की भक्ति का विधान भी एक स्वप्न के समान  है  इनका कोई महत्व नहीं है  गुरू के मुख से राम नाम की महिमा समझकरराम नाम के जाप में लीन रहने वाला ही जागा हुआ है ,  अन्य सभी सोये हुए हैं  राम राम  !
साँख जोग नवधा भक्तियह सुपने की रीत 
दरिया जागे गुरूमुखी , तत नाम से प्रीत (5)
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि सांख्य शास्त्रयोग शास्त्र तथा नौ प्रकार की भक्ति का विधान भी एक स्वप्न के समान  है  इनका कोई महत्व नहीं है  गुरू के मुख से राम नाम की महिमा समझकरराम नाम के जाप में लीन रहने वाला ही जागा हुआ है ,  अन्य सभी सोये हुए हैं  राम राम  !
दरिया सतगुरु कृपा करशब्द लगाया एक 
लागत ही चेतन भया , नेतर खुला अनेक  (6)
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि गुरुदेव कृपा करके शिष्य को जगाते हैं  उनके एक ही शब्द से शिष्य के सारे ज्ञान के दरवाजे खुल जाते हैं  सतगुरु के जगाने पर ऊर्जाशक्ति जागृत होती है तब अनन्त विषयों का ज्ञान हो जाता है - यही अनेक नेत्रों का खुलना है  राम राम  !

अथ श्री दरियावजी महाराज की दिव्य वाणीजी का सुपने का अंग संपूर्ण हुआ  राम !

 आदि आचार्य श्री दरियाव जी महाराज एंव सदगुरुदेव आचार्य श्री हरिनारायण जी महाराज की प्रेरणा से श्री दरियाव जी महाराज की दिव्य वाणी को जन जन तक पहुंचाने के लिए वाणी जी को यहाँ डिजिटल उपकरणों पर लिख रहे है। लिखने में कुछ त्रुटि हुई हो क्षमा करे। कुछ सुधार की आवश्यकता हो तो ईमेल करे dariyavji@gmail.com .

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हंस उदास का अंग

हंस उदास का अंग

अथ श्री दरियावजी महाराज की दिव्य वाणीजी का “हंस उदास का अंग” प्रारंभ

कबहुक भरिया समुन्दर साकबहुक नाहीं छांट  
 जन दरिया इत उतरता , ते कहिए किरकाँट (1) 
 आचार्यश्री दरियावजी महाराज कहते हैं कि साधक जब साधना करते हैं तब कभी-कभी समुन्दर के समान गंभीर हो जाते हैं तथा अनंतानंत प्रेम रूपी पानी से भर जाते हैं परन्तु कभी-कभी आपके अंतःकरण में एक बूँद भी पानी नहीं रहता है ।आचार्यश्री ने ऐसे साधकों को किरकांट  (गिरगिट ) की उपमा दी है जो वर्षात के दिनों में सात रंग बदलता है  राम राम!

 किरकाँट्या किस काम कापलट करै बहु रंग  
 जन दरिया हँसा भलाजद तद एकै रंग  (2) 
 आचार्यश्री दरियावजी महाराज कहते हैं कि जो साधक बार-बार साधना को बदलते रहते हैंवे किरकाँट्या की भांति हैं  परन्तु हँस भला है , जो एक ही रंग रखता है  अतः जीवन में ऐसी निष्ठा का उदय होना अतिआवश्यक है जिससे साधक के जीवन में विघ्नों का प्रभाव नहीं पड़ता है  राम राम!

एक रंग उलटी दशाभीतर भर्म  भाल  
जन दरिया निज दास का ,तन मन मता मराल (3)
 आचार्यश्री दरियावजी महाराज कहते हैं कि जीवन में एक ही रंग होना चाहिए जिससे  दूसरा रंग चढ़ ही नहीं सकता है ।इस प्रकार दशा उलट जाती हैअंतःकरण में साधना के प्रति कोई संदेह  (भ्रम)नहीं रहता है तथा सतगुरू के वचनों पर दृढ़ विश्वास हो जाता हैवही साधक वास्तव में तन और मन दोनों से हंस के समान है  राम राम!
दरिया हँसा ऊजलाबगुलहु उज्जवल होय  
  दोनों एकहि सारिखा , पर चेजै पारख होय (4) 
  आचार्यश्री दरियावजी महाराज कहते हैं कि हंस भी सफेद होता है तथा बगुला भी सफेद होता है  दोनों के शरीर के रंग बाहर से एक जैसे होते हैं परन्तु उनकी आंतरिक भावना में रात-दिन का अन्तर होता है  परीक्षा तो तब होती है जब हंस एवं बगुला के सामने मोती एवं मांस दोनों रखदो तो हंस केवल मोती खाता है तथा बगुला मांस खाता है  अतः महाराजश्री कहते हैं कि चाहे सभी मनुष्य एक ही आकार तथा रूप-रंग के होंपरन्तु संग प्रभाव होने से उनके आचरण में बहुत अन्तर होता है  अतः अच्छा संग करना अतिआवश्यक है  राम राम.

दरिया बगुला ऊजला,उज्जवल ही होय हँस  
वे सरवर मोती चुगे , वाके मुख में मँस (5) 
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि हँस और बगुला दोनों बाहर से एक जैसे (सफेद ) होते हैं परन्तु हँस सरोवर में मोती चुगता है तथा बगुला माँस (मछलियाँचुगता है  राम राम!

वांका चेजा ऊजला , वांका खाद्य निषेध  
जन दरिया कैसे बनेहँस बगुल के भेद (6) 
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि हँस का व्यवहार बहुत ही सीधा सुंदर तथा प्राणीमात्र के लिए हितकारक होता है  परन्तु बगुला मछलियां खाता है तथा दूसरों को दुख-ही दुख देता है  इस प्रकार दोनों के विपरीत आचरण है जिनका आपस में मैल नहीं हो सकता है  राम राम!

जन दरिया हँसा तना,देख बड़ा व्यवहार  
तन उज्जवल मन ऊजला , उज्जवल लेत आहार  (7) 
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि हँस का कितना सुंदर व्यवहार है  उसका तन उज्ज्वल है तो मन भी उज्ज्वल है तथा व्यवहार भी उज्ज्वल है  इसी प्रकार मनुष्य मात्र को अपना व्यवहार बनाना चाहिए  राम राम !

बाहर से उज्ज्वल दसा , भीतर मैला अंग  
ता सैती कौआ भलातन मन एकहि रंग  (8) 
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि बगुला केवल बाहर से ही उज्ज्वल होता है परन्तु अन्दर से वह बहुत मैला होता है  अतः उसकी अपेक्षा तो कौआ अच्छा है जो कि बाहर से काला है तो अंदर से भी काला है  इस तरह जिनके हृदय में बुराई होती है वे बाहर से भी बुरा व्यवहार करते हैं परन्तु वे बगुले के समान व्यक्ति से अच्छे हैं  राम राम!

बाहर से उज्जवल दसाअन्तर उज्ज्वल होय 
दरिया सोना सोल्हवां , कांट  लागे कोय (9) 
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि जो बाहर से उज्ज्वल व्यवहार करते हैं तथा अंदर भी उज्ज्वल (शुद्ध ) भावना रखते हैंवे सोल्हवां सोने के समान होते हैं  अर्थात किसी भी परिस्थिति में उसे काँट (अविद्या ) नहीं लग सकती  राम राम!

मान सरवर मोती चुगे,दूजा नांहि खान  
दरिया सुमिरै राम को ,सो निज हँसा जान (10) 
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि मानसरोवर में केवल मोती चुगता है अर्थात जिसे दूसरा कोई खाद्य पदार्थ अच्छा नहीं लगता हैवही वास्तव में हँस है  इसी प्रकार से सच्चा साधक वही है जो सदा ही राम नाम जाप करता रहता हैवही वास्तव में हँस प्रवृत्ति का साधक है  राम राम!

मान सरोवर वासिया , छीलर रहै उदास  
जन दरिया भज राम को , जब लग पिंजर श्वास  (11) 
आचार्यश्री दरियावजी महाराज फरमाते हैं कि जो व्यक्ति मानसरोवर में रहने लग जाता है , वह कभी छीलरिया अर्थात तालाबों में नही जाएगा  अतः महाराजश्री अन्त में मानव मात्र को यही उपदेश देते हैं कि जब तक शरीर में श्वास हैतबतक तुम भगवत भजन करते ही रहो  राम राम !

अथ श्री दरियावजी महाराज की दिव्य वाणीजी का हँस उदास का अंग संपूर्ण हुआ  राम 

आदि आचार्य श्री दरियाव जी महाराज एंव सदगुरुदेव आचार्य श्री हरिनारायण जी महाराज की प्रेरणा से श्री दरियाव जी महाराज की दिव्य वाणी को जन जन तक पहुंचाने के लिए वाणी जी को यहाँ डिजिटल उपकरणों पर लिख रहे है। लिखने में कुछ त्रुटि हुई हो क्षमा करे। कुछ सुधार की आवश्यकता हो तो ईमेल करे dariyavji@gmail.com
डिजिटल रामस्नेही टीम को धन्येवाद।

दासानुदास

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मिश्रित साखी का अंग

मिश्रित   साखी   का   अंग अथ   श्री   दरियावजी   महाराज   की   दिव्य   वाणीजी   का  "  मिश्रित   साखी   का   अंग  "  प्रारंभ  ...